Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 53, Verse 48
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 53, verse 48 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 53 · श्लोक 48
संस्कृत श्लोक
उत्थाय सत्त्वरूपेण योन्या सत्यमयात्मकम् ।
न तज्जगदुःखमिदं व्यर्थं सदृशमात्मनः ॥ ४८ ॥
हिन्दी अर्थ
मोक्ष का सम्पादन यदि न किया जाय, तो क्या क्षति है, ऐसा यदि कोई कहे, तो उस पर कहते हैं।
सत्य एकत्व स्वभाव ब्रह्म असत्य मायावश देवता, मनुष्य, तिर्यगादि चौरासी लाख योनियों द्वारा
तत् तत् प्राणियों के रूप से उत्पन्न होकर व्यर्थ ही जगत्दुःख का अनुभव करता है । यह उसके
स्वरूपानुरूप नहीं है