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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 53, Verse 34

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 53, verse 34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 53 · श्लोक 34

संस्कृत श्लोक

तमोरूपो हि संकल्पो नित्यं प्राकृतचेष्टया । परां कृपणतामेत्य प्रयाति कृमिकीटताम् ॥ ३४ ॥

हिन्दी अर्थ

पहले सर्ग में जो तीन शरीर कहे गए थे, उन्हीका विस्तार करते हैं। उस संकल्पात्मक मन के सत्व, रज और तम नामक उत्तम, मध्यम ओर अधम तीन शरीर इस जगत स्थिति के कारण हैं ॥३ ३॥ तमोरूप संकल्प प्राकृत चेष्टा से (स्वाभाविक प्रवृत्ति से) नरकों में प्रसिद्ध परमदीनता को प्राप्त होकर कृमि-कीट योनि में प्राप्त होता है । यहाँ पर कृमि, कीट का ग्रहण स्थावर आदि योनियों का भी उपलक्षक है