Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 53, Verse 14
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 53, verse 14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 53 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
अध उर्व्यां तथोर्ध्वं खे पुण्यापुण्यधनश्रियः ।
नरामरकिराटानां यत्रान्तः क्रयविक्रयौ ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
*ऊर्ध्वाधोगतिरूपेण वाणिमार्गेण संकुलम्” (शास्त्रीय कर्मो से ऊर्ध्वगति होती है, अशास्त्रीय
कर्मों से अधोगति होती है, इस प्रकार के व्यापारी मार्ग से परिपूर्ण) सा जो पहले कहा था, उसका
अर्थ कहते हैं ।
नीचे पृथ्वी पर तथा ऊपर आकाश में पुण्य और पाप ही जिनकी धन-सम्पत्ति है, उन कर्म और
उपासना में अधिकारी श्रेष्ठ पुरुषों, देवताओं ओर म्लेच्छ देश में रहनेवाले कर्माधिकार से रहित पुरुषों
के क्रय, विक्रय जिस पुर में होते हैं ( & )