Sthiti Prakarana (Existence) · Sarga 39
अडतीसवाँ सर्ग समाप्त उनतालीसवाँ सर्ग ब्रह्म की सर्वशक्तिता, श्रीरामचन्द्रजी के मोह का विस्तार, उनके बोध के लिए श्री वसिष्ठजी के विचार आदि का वर्णन ।
35 verse-groups
- Verse 1अज्ञद्रष्डि मे ही स्थित श्रीरामचन्द्रजी गुरुवचनों में विश्वास होनेके कारण परोक्षरूप से ही…
- Verse 2क्या ये अज्ञद्गष्टि में रहकर शंका करते है, अथवा थोड़ी बहुत अभिज्ञता को प्राप्त होकर अज्ञत…
- Verses 3–5जिनमें शक्ति नहीं है, उन्हीं में विरोध होता है, सर्वशक्तिशाली में तो कोई विरोध नहीं है, इ…
- Verse 6उक्त अर्थ में श्लोको को उद्धृत करते हैं। सभी जीवों की, सभी चारों ओर की दृष्टियों की, सभी…
- Verse 7सागर में तरंगों के समान परमात्मा से सब उत्पन्न होते हैं, उसी में लीन हो जाते हैं और चित्…
- Verse 8श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे भगवन् विरुद्ध होने के कारण आपके वाक्यार्थ का समझमें आना बड़ा…
- Verse 9मन ओर इन्द्रियों की वृत्ति से परे ब्रह्मतत्त्व कहाँ ! उससे उत्पन्न हुई क्षणभंगुर पदार्थ श…
- Verses 10–13लोक में जो जिससे उत्पन्न होता है, वह उसके सदुश ही होता है, जैसे दीपक से दीपक, पुरुष से पु…
- Verses 14–15तच्त्वद्ृष्टि से श्रीवसिष्ठजी जगत के चिद्भाव को एवं अविकारता को देखते हुए समाधान करते है…
- Verse 16अज्नद्ृष्टि में ही स्थित श्रीरामचन्द्रजी सर्वथा एकमात्र आनन्दस्वरूप ब्रह्म की आनन्द विरुद…
- Verses 17–18इस प्रकार निरुत्तर हुए श्रीवसिष्ठजी का श्रीरामचन्द्रजी को समझाने के लिए उपाय का चिन्तन श्…
- Verses 19–20जो पुरुष जगत की जडता का परित्याग कर चिदेकरसता को देखने में समर्थ है, उस धीमान और ज्ञातज्ञ…
- Verse 21परन्तु जिसकी मति पूर्णरूप से व्युत्पन्न नहीं हुई, उसको यह सब ब्रह्म ही है, यह पूर्वोक्त उ…
- Verse 22तो कौन उस प्रकार के उपदेश का उपयुक्त पात्र है, ऐसी शका होने पर कहते हैं। तत्त्ववोधरूप परम…
- Verse 23अर्धव्युत्पन्न पुरुष को किस प्रकार उपदेश देना चाहिए, इस पर कहते हैं। पहले शम, दम आदि गुणो…
- Verse 24अज्ञ को या अर्धप्रबुद्ध को सर्व ब्रह्म" (यह सब ब्रह्म है) ऐसा उपदेश दे, उसने उस अज्ञानी क…
- Verse 25जिसकी बुद्धि प्रबुद्ध हो गई हे, भोगेच्छा क्षीण हो गई है ओर कामना मिट गई है, उस महात्मा मे…
- Verse 26जिसे तत्त्वज्ञान नहीं है, वही अनधिकारी को उपदेश देने के लिए प्रवृत्त होता है । शिष्यो को…
- Verse 27ऐसा विचारकर अज्ञानरूपी अन्धकार का विनाश करनेवाले अतएव भूमि में स्थित सूर्य के सदृश मुनिश्…
- Verse 28हे निष्पाप श्रीरामचन्द्रजी, ब्रह्म मेँ कलंक हे, अथवा नहीं, यह बात आप स्वयं जान जायेंगे ।…
- Verses 29–30इस समय अर्धव्युत्पन्न पुरुष से कहने योग्य ब्रह्म की पूर्वोक्त सर्वशक्तिसम्पन्नता आदि और प…
- Verse 31माया से ही ब्रह्म की सर्वशक्तिता और प्रत्यगात्मा की सर्वात्मकता है, इसका स्पष्टीकरण करते…
- Verses 32–33तो क्या आकाश को नीचे रखने के लिए भूतल को कहीं दूसरी ओर ले जाता है, ऐसी कोई शंका करे, तो उ…
- Verse 34जैसे पद्मराग मणि के महलों में आकाश का प्रतिबिम्ब आधार की लालिमा से ही लाल होता है, वैसे ह…
- Verse 35इस प्रकार एक वस्तु सब प्रकार से सब होती है, इसलिए इस विषय में असंभावना, हर्ष और क्रोध आदि…
- Verses 36–39इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजी की असंभावना का निरास कर पूर्वोक्त समता स्थिति का ही विधान करते…
- Verse 40तभी हर्ष, क्रोध, आश्चर्य आदि का आत्यन्तिक विनाश होता है, इस आशय से श्लोक उद्धृत करते हैं।…
- Verse 41इस जगत में न कोई कर्ता है, न भोक्ता हे, न यह जगत विनाश को प्राप्त होता है
- Verse 42साक्षी निर्विकार केवल आत्मतत्त्व के नित्य अपने में समरूप से क्षोभरहित रहने पर ऐसा होता है
- Verses 43–44वैसे परमार्थ के रहने पर भी जगत प्राप्ति में द्ृष्टान्त दशनिवाले दो श्लोको का अवतरण किया ग…
- Verse 45इस प्रकार केवल अपनी सन्निधि से उत्पन्न हो रहे जगत के दोषों से लिप्त न हो रहा आत्मा ही जगत…
- Verses 46–48इस प्रकार असत् जगत का असत्तात्मक विनाश स्वतः ही होता है और सत्तात्मिका उत्पत्ति ओर स्थित…
- Verse 49आत्मसत्ता का जगत में अध्यास जगत का जन्म है, आत्मा का जन्म नहीं है, क्योकि आत्मा में भेद न…
- Verse 50उत्पन्न हुए उन पदार्थों की उत्पत्ति होते ही तुरन्त अविद्या उत्पन्न होती है, अभिमानलक्षण व…
- Verse 51संसाररूपी वृक्ष का ही वर्णन करके उसके उच्छेद का उपाय बतलाते हैं। उक्त संसाररूपी वृक्ष आशा…