Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 39, Verse 51
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 39, verse 51 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 39 · श्लोक 51
संस्कृत श्लोक
आशामञ्जरिताकृतिं विफलितं दुःखादिभिर्दारुणैर्भोगैः पल्लवितं जराकुसुमितं तृष्णालताभासुरम् ।
संसाराभिधवृक्षमात्मनिगडं छित्त्वा विवेकासिना मुक्तस्त्वं विहरेह वारणपतिः स्तम्भादिवोन्मोचितः ॥ ५१ ॥
हिन्दी अर्थ
संसाररूपी वृक्ष का ही वर्णन करके उसके उच्छेद का उपाय बतलाते हैं।
उक्त संसाररूपी वृक्ष आशारूपी मंजरियों से युक्त है, सुख-दुःख आदि विविध फलों से लदा है,
दारुण दुःख आदि भोगो से पल्लवित है, बुढ़ापारूपी फूल से युक्त है और तृष्णारूपी लता से दैदीप्यमान
है। अपने बन्धनरूप इस संसार नामक वृक्ष को विवेकरूपी तलवार से काटकर स्तम्भ से खोले गये
गजराज की तरह मुक्त हुए आप इस संसार में विहार कीजिए