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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 39, Verses 43–44

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 39, verses 43–44 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 39 · श्लोक 43,44

संस्कृत श्लोक

सति दीप इवालोकः सत्यर्क इव वासरः । सति पुष्प इवामोदः स्वतः संपद्यते जगत् ॥ ४३ ॥ आभासमात्रमेवेदं परिदृश्यत एव च । स्पन्दः समीरणस्येव न सन्नासदवस्थितम् ॥ ४४ ॥

हिन्दी अर्थ

वैसे परमार्थ के रहने पर भी जगत प्राप्ति में द्ृष्टान्त दशनिवाले दो श्लोको का अवतरण किया गया है । जैसे दीप के रहने पर प्रकाश स्वतः होता है और जैसे फूल के रहने पर सुगन्ध स्वतः होती है वैसे ही जगत स्वतः ही उत्पन्न होता है। वायु से स्पन्दन की तरह यह आभासमात्र ही दिखाई देता हे, अतएव यह न सत्‌ और न असत्‌ है यानी अनिर्वचनीयरूप से अवस्थित है