Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 39, Verses 14–15
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 39, verses 14–15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 39 · श्लोक 14,15
संस्कृत श्लोक
ब्रह्मैवेदं स्थितं नाम मलमस्तीह नानघ ।
तरङ्गौघगणैरम्भः सिन्धौ स्फुरति नो रजः ॥ १४ ॥
द्वितीया कल्पनैवेह न रघूद्वह विद्यते ।
ब्रह्ममात्रादृते वह्नावौष्ण्यमात्रादृते यथा ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
तच्त्वद्ृष्टि से श्रीवसिष्ठजी जगत के चिद्भाव को एवं अविकारता को देखते हुए समाधान करते हैं ।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे निष्पाप श्रीरामचन्द्रजी, यह ब्रह्म ही है, यहाँ पर मल नहीं है। सागर में
तरंगसमूहरूप से जल ही स्फुरित होता है, धूलि तरंग समूहरूप से स्फुरित नहीं होती। हे श्रीरामचन्द्रजी,
जैसे अग्नि में एकमात्र उष्णता के सिवा दूसरी कल्पना नहीं है, वैसे ही एकमात्र ब्रह्म के सिवा यहाँ पर
दूसरी कल्पना है ही नहीं