Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 39, Verse 50
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 39, verse 50 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 39 · श्लोक 50
संस्कृत श्लोक
अवतीर्णानां च तेषामवतरणसमकालमेवाविद्योदेति तत्त्वज्ञानं दृढतामेति तदनु शतसहस्रस्कन्धो विचित्रशुभाशुभफलभरफलितो भूरिशाखः स्फारतामेति संसारद्रुमः ॥ ५० ॥
हिन्दी अर्थ
उत्पन्न हुए उन
पदार्थों की उत्पत्ति होते ही तुरन्त अविद्या उत्पन्न होती है, अभिमानलक्षण वह अज्ञान समय आने पर
दृढ़ हो जाता है । तदनन्तर सैकड़ों, हजारों तनो से युक्त, विचित्र शुभ और अशुभरूप फलों से लदा
हुआ, प्रचुर शाखा और प्रशाखाओं से युक्त संसाररूपी वृक्ष विशालता को प्राप्त होता है