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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 39, Verses 46–48

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 39, verses 46–48 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

स्थिति प्रकरण · सर्ग 39 · श्लोक 46-48

संस्कृत श्लोक

नश्यतीह हि तद्वस्तु नात्मभूतं यदात्मनः । कथं नश्यति तद्वस्तु स्वात्मभूतं यदात्मनः ॥ ४६ ॥ जायते नैव तद्वस्तु नात्मभूतं यदात्मनः । जायते चैव तद्वस्तु स्वात्मभूतं यदात्मनः ॥ ४७ ॥ कथं तज्जायते तस्मात्स्वात्मभूतं यदात्मनः ॥ ४८ ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार असत्‌ जगत का असत्तात्मक विनाश स्वतः ही होता है और सत्तात्मिका उत्पत्ति ओर स्थिति ब्रह्मसत्ता से ही हैं, यो विभाग होने पर फलितार्थ कहते हैं। जो वस्तु आत्मा की आत्मभूत नहीं है, वह वस्तु यहाँ पर नष्ट ही होती हे । जो वस्तु आत्मा की स्वरूपभूत है, वह कैसे नष्ट हो सकती है ? जो वस्तु आत्मा की स्वरूपभूत नहीं है, वह उत्पन्न होती ही नहीं है, जो वस्तु आत्मा की स्वरूपभूत है, वही उत्पन्न होती है और वही स्थित रहती है। "जायते" यह स्थिति का भी उपलक्षण है। जो वस्तु आत्मा की आत्मभूत है, वह उससे कैसे उत्पन्न होगी इसलिए उसकी उत्पत्ति कल्पनामात्र है