Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 39, Verses 36–39
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 39, verses 36–39 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 39 · श्लोक 36
संस्कृत श्लोक
समतयैव सततं धृतिमता स्थातव्यम् ॥ ३६ ॥
विस्मयस्मयसंमोहहर्षामर्षविकारिताम् ।
समतावलितस्तज्ज्ञो न कदाचन गच्छति ॥ ३७ ॥
अपर्यवसाने देशकालवति चित्रा हि जगति युक्तयो दृश्यन्ते ॥ ३८ ॥
एताश्च युक्तीर्नामासावात्मा यत्नेन रचनां करोति न चोत्पन्नां तिरस्करोति सागर इव वीचीः ॥ ३९ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजी की असंभावना का निरास कर पूर्वोक्त समता स्थिति का ही विधान
करते हैं।
हे श्रीरामचन्द्रजी, धैर्यशाली पुरुष को सदा समता से ही रहना चाहिए