Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 39, Verses 17–18
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 39, verses 17–18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 39 · श्लोक 17,18
संस्कृत श्लोक
श्रीवाल्मीकिरुवाच ।
इत्युक्ते तत्र रामेण चिन्तयामास चेतसा ।
वसिष्ठो मुनिशार्दूलो राघवस्योपदेशने ॥ १७ ॥
परं विकासमायाता नास्य तावदियं मतिः ।
किंचिन्निर्मलतां प्राप्ता प्रोह्यते चेह वस्तुनि ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार निरुत्तर हुए श्रीवसिष्ठजी का श्रीरामचन्द्रजी को समझाने के लिए उपाय का चिन्तन
श्रीवाल्मीकिजी कहते हैं।
वाल्मीकिजी ने कहा : हे वत्स, श्रीरामचन्द्रजी के ऐसा कहने पर मुनिश्रेष्ठ श्रीवसिष्ठजी
श्रीरामचन्द्रजी को उपदेश देने के लिए मन से विचार करने लगे कि अभी तक श्रीरामचन्द्रजी की बुद्धि
पूर्ण विकास को प्राप्त नहीं हुई है । कुछ निर्मलता को प्राप्त हुई यह परमतत्त्व में प्राप्त कराई गई कही
है