Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 39, Verse 45
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 39, verse 45 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 39 · श्लोक 45
संस्कृत श्लोक
निर्दोषवदेव जागतीनां दृष्टीनां परमार्थतो भगवान्स्थितो विनष्टानां पुनः कर्ता कृतानां वा नाशयिता स केवलं कदाचित्प्रकटाः कदाचिदल्पप्रकटाः कदाचिदप्रकटास्तारका इव कुसुमराशयः ॥ ४५ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार केवल अपनी सन्निधि से उत्पन्न हो रहे जगत के दोषों से लिप्त न हो रहा आत्मा ही
जगत का कर्ता-सा, हर्ता-सा और नियन्ता-सा ऐसे प्रतीत होता है, जैसे कि आकाश तारारूपी
पुष्पराशि्यो का कर्ता, हर्ता ओर नियन्ता प्रतीत होता है, ऐसा कहते हैं।
परमार्थरूप से निर्दोष के तुल्य ही स्थित होकर भगवान विनष्ट हुई जगत की दृष्टियों के पुनः कर्ता
होते हैं और की गई जगत की दृष्टियों के नाशक होते हैँ । जैसे केवल आकाश में तारारूपी फूल राशियाँ
कभी प्रकट ओर कभी अप्रकट होती हैं, वैसे ही उसमें ये जगत की दृष्टियाँ कभी प्रकट होती हैं और
कभी अप्रकट होती हैं