Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 39, Verse 40
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 39, verse 40 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
स्थिति प्रकरण · सर्ग 39 · श्लोक 40
संस्कृत श्लोक
किं तर्हि क्षीर इव घृतं घट इव मृदि पट इव तन्तुषु वट इव धानायात्मन्येव स्थिताः शक्तयः प्रकटतामागता व्यवह्रियन्तेऽविरचितमेव तरङ्गवत् ॥ ४० ॥
हिन्दी अर्थ
तभी हर्ष, क्रोध, आश्चर्य आदि का आत्यन्तिक विनाश होता है, इस आशय से श्लोक उद्धृत
करते हैं।
समतारूपी कवच से परिवेष्टित तत्त्वज्ञानी पुरुष आश्चर्य, गर्व, मोह, हर्ष, क्रोध आदि विकारों को
कभी प्राप्त नहीं होता है ॥ ३ ७॥ समता का पर्यवसान होने पर देश और काल से युक्त जगत में ये विचित्र
दृश्यरचनारूप युक्तियाँ दिखाई देती हैं ॥३ ८॥
यह आत्मा सामग्रीयुक्त अवस्थाओं से युक्त सृष्टिरचना यत्न से करता है। उत्पन्न हुई उन रचनाओं
का, जैसे सागर तरंगों का तिरस्कार नहीं करता, वैसे ही तिरस्कार नहीं करता ॥ ३ ९॥ तो दूध में घृत की
तरह, मिट्टी में घड़े की तरह, तन्तुओं में वस्त्र की तरह ओर वट के बीज में वटवृक्ष की तरह आत्मा में ही
स्थित प्रकटता को प्राप्त हुई शक्तियों का कथंचित व्यवहार होता है । यह व्यवहार दृष्टि एकमात्र
कल्पना ही है। परमार्थतः तो जगत अविरचित ही है