Utpatti Prakarana (Creation) · Sarga 119
एक सौ अद्वारहवाँ सर्ग समाप्त एक यो उन्नीसवाँ सर्ग मायिक रूप का निराकरण कर एकमात्र सन्मात्रत्व का प्रदर्शन और भूमिकाओं में स्थिर करने के लिए युक्ति के विस्तार से वर्णन ।
30 verse-groups
- Verse 1उसके लिए परमात्मा को सहज स्वकीय पूणनिन्द स्वप्रकाशरूपता का विस्मरण होने पर मायिक जीवभाव औ…
- Verse 2श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे मुनिजी, सुवर्ण में अँगूठी की भ्रान्ति का उदय कैसे होता है और…
- Verse 3श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, सत् के उत्पत्ति ओर विनाश स्वतःसिद्ध द्रष्टा…
- Verse 4अहन्ता और अँगूठीपना कभी भी सत् नहीं है, इसलिए उनके उत्पत्ति और नाश भी नहीं हो सकते । जाय…
- Verse 5श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे भगवन्, यदि सुवर्ण ही खरीदना, बेचना आदि सम्पूर्ण व्यवहारों का…
- Verse 6श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, असत् के रूपरहित रूप का यदि निरूपण किया जाता है…
- Verse 7अँगूठीपना जो है वह केवल भ्रान्ति है वह असत्स्वरूपिणी माया है। यदि असत् का रूप कहा जाय तो…
- Verse 8ऐसी ही प्रस्रिद्धि दूसरे माया कार्य में दिखलाते हैं । मृगतृष्णा के जल में और दो चन्द्रमाओ…
- Verses 9–10जो पुरुष सीप में चाँदी से आकार को देखता है, वह चाँदी के अणुमात्र कण को एक क्षण के लिए भी…
- Verse 11जो वस्तु नहीं है, उसकी असत्ता विचार करने पर प्रकाशित होती है । यदि विचार न किया जाय, तो म…
- Verse 12यदि कोई शंका करे, असद् वस्तु की सत्कार्यकारिता ओर स्थिरता कहाँ देखी गई है ? तो इस पर कहत…
- Verses 13–14जैसे बालू में तेल आदि नहीं हे वैसे ही सुवर्णं में केवल सुवर्णता को छोड़कर अन्य अंगूठीयकत्…
- Verse 15सद्वस्तु हो चाहे असद्रस्तु हो, जो हृदय में सुदृढरूप से जम गई, वही अर्थक्रियाकारी होती है…
- Verses 16–17यह परम अविद्या है, यही माया है ओर यही संसार है, जो कि प्रतिष्ठारहित असत् अहन्त्व की भावन…
- Verses 18–21ब्रह्म से अतिरिक्त सब अवस्तु है यह बात “अथातो नेति नेति “स एष नेति नेत्यात्मा“, (तदेतद्…
- Verses 22–23सब जगत् का पारमार्थिक रूप शान्त यानी अधिष्ठानसन्मात्र, निराधार, अविनाशी, कल्याणमय, दोष आ…
- Verse 24इस प्रकार निष्प्रपच पारमार्थिक एकरस ब्रह्म का बोध कराने पर भी उसमें चित्त्वृत्तिको स्थिरक…
- Verse 25यदि आपको तत्त्व ज्ञात हो गया, तो फिर जो यह जगत् की प्रतीति है वह ब्रह्ममान ही है । निमित…
- Verse 26महार्णव के जल में जल के तुल्य परमेश्वर में यह सृष्टि स्थित है । भेद इतना ही है कि जल द्रव…
- Verse 27सूर्य आदि की ज्योति के तुल्य वह स्वप्रकाश है भेद इतना ही है कि सूर्य आदि की ज्योति अपने म…
- Verse 28जैसे नीचे-ऊपर छोड़कर समुद्र के मध्य में जल ही जल रहता है वैसे ही चित् होने से परम पद वह…
- Verses 29–30आपका बोध परिपक्व नहीं है, इसलिए आपकी दृष्टि में चिद्रूप परमतत्त्व मानों चेत्यता को प्राप्…
- Verses 31–33चित्त के आत्यन्तिक विनाश का अभाव ही आपके पुनः सृष्टिदर्शन में हेतु है, इस आशय से कहते हैं…
- Verse 34जैसे शिल्पियों की मिट्टी की बनी हुई पुरुषाकार सेना युद्धादि पुरुषार्थ करनेवाली सी प्रतीत…
- Verses 35–36परमार्थिक दृष्टि होने पर तो यह जगत् पूर्ण ब्रह्म ही अवशिष्ट रहता है, इस पर ूर्णमिदं पूर्…
- Verse 37दर्पण में प्रतिबिम्बरूप से स्थित नौ योजनवाले दीर्घ नगर में जैसे दूरता ओर समीपता दोनों हैं…
- Verse 38इस प्रकार सत् का ही असत् विश्व के आकार से भान होनेसे तत््वदुष्टि से सत् ही उदित हुआ है…
- Verse 39यह सृष्टि दर्पण में प्रतिबिम्बित नगर के तुल्य हे ओर मृगतृष्णा के जल के समान प्रकाशमान है…
- Verse 40जैसे एेन्द्रजालिक पुरुषो द्वारा दूसरे को मोह में डालने के लिए अभिमन्त्रित ओषधि के चूर्ण क…
- Verse 41जब तक वासना के सहित अविद्या का विनाश सप्तम भूमिकारोहण पर्यन्त नहीं हुआ, तब तक विक्षेपदु:ख…