Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 119, Verse 28
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 119, verse 28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 119 · श्लोक 28
संस्कृत श्लोक
अध ऊर्ध्वं वर्जयित्वा यथाब्धेरुदरे पयः ।
स्फुरत्येवं परे चित्त्वादिदं नानेव तत्परम् ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे नीचे-ऊपर छोड़कर समुद्र के मध्य में जल ही जल रहता है वैसे ही चित् होने से परम पद
वह परम ही नाना रूप से स्फुरित होता है