Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 119, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 119, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 119 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
ऊर्मिकासंविदा हेम यथा विस्मृत्य हेमताम् ।
विरौति नाहं हेमेति तथात्माहंतयानया ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
उसके लिए परमात्मा को सहज स्वकीय पूणनिन्द स्वप्रकाशरूपता का विस्मरण होने पर
मायिक जीवभाव और जगत्भाव के आरोप से विविध दुःख, शोक आदि की प्राप्ति होने में
दृष्टान्त कहते हैं।
जैसे सुवर्ण सब जगह सब कालों मे एकमात्र सुवर्णस्वभाव है लेशमात्र भी उसमें
सुवर्णशून्यता नहीं है, फिर भी वह अपने में कल्पित अँगूठी की भ्रान्ति से अपनी सुवर्णरसता
को (एकमात्रसुवर्णरूप को) न देखकर बाहरी मन के संसर्ग से होनेवाली कांस्यता की
कल्पना से “मेँ सोना नहीं हूँ” यों रोता है (यद्यपि जड़ सुवर्णं का रोदन सम्भव नहीं है तथापि
“अँगूठी' शब्द के व्यवहार से अथवा स्वामी के रोदन से सुवर्णरोदन का व्यवहार होता है)
वैसे ही आत्मा भी अहन्ता से रोता है
सर्ग सन्दर्भ
एक सौ अद्वारहवाँ सर्ग समाप्त एक यो उन्नीसवाँ सर्ग मायिक रूप का निराकरण कर एकमात्र सन्मात्रत्व का प्रदर्शन और भूमिकाओं में स्थिर करने के लिए युक्ति के विस्तार से वर्णन ।