Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 119, Verses 18–21
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 119, verses 18–21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 119 · श्लोक 18-21
संस्कृत श्लोक
न सनातनता काचिन्न च काचिद्विरिञ्चिता ।
न च ब्रह्माण्डता काचिन्न च काचित्सुतादिता ॥ १८ ॥
न लोकान्तरता काचिन्न च स्वर्गादिता क्वचित् ।
न मेरुता नासुरता न मनस्त्वं न देहता ॥ १९ ॥
न महाभूतता काचिन्न च कारणता क्वचित् ।
न च त्रिकालकलना न भावाभाववस्तुता ॥ २० ॥
त्वत्ताहन्तात्मता तत्ता सत्ताऽसत्ता न काचन ।
न क्वचिद्भेदकलना न भावो न च रञ्जना ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
ब्रह्म से अतिरिक्त सब अवस्तु है यह बात “अथातो नेति नेति “स एष नेति नेत्यात्मा“,
(तदेतद् ब्रह्मापूर्वमनन्तरमबाह्यम्*, “नेह नानास्ति किंचन“, यत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छरणोति
नान्यद्विजानाति स भूमा“ इत्यादि द्वैत का निषेध कहनेवाली हजारों श्रुतियो से सिद्ध है, इस
आशय से कहते हैं।
कालातीत परमात्मा में सर्वकाल सम्बन्ध रूप न सनातनता है, न कोई विरचिता हे, न
कोई ब्रह्मण्डता है, न कोई प्रजापतिता है, न कोई अन्यलोकता है, न कहीं पर स्वगदिता है,
न मेरुता है, न असुरता है, न मनस्त्व है, न देहता है, न कोई महाभूतता है, न कहीं कारणता
है, न भूत, भविष्यत् और वर्तमान कालों की कल्पना है, न भाव वस्तु है, न अभाव वस्तु है,
त्वत्ता, अहन्ता, आत्मता, तत्ता, सत्ता, असत्ता कोई भी नहीं है, न कहीं पर भेद की कल्पना
है, न राग है और न राग का कार्य रंजन ही है