Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 119, Verse 11
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 119, verse 11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 119 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
यन्नास्ति तस्य नास्तित्वं प्रेक्ष्यमाणं प्रकाशते ।
अप्रेक्ष्यमाणं स्फुरति मृगतृष्णास्विवाम्बुधीः ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
जो वस्तु नहीं है, उसकी असत्ता विचार करने
पर प्रकाशित होती है । यदि विचार न किया जाय, तो मृगतृष्णा में जलबुद्धि की तरह वह
स्फुरित होती है जैसे कि सीप में रजतभाव का दर्शन होता है । यदि सीप का दर्शन न हो, तो
वह रजतरूप में प्रतीत होती है । असत् ही सत्कार्य करनेवाला ओर स्थिर होता है