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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 119, Verses 16–17

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 119, verses 16–17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 119 · श्लोक 16,17

संस्कृत श्लोक

परमैषैव सा विद्या मायैषा संसृतिर्ह्यसौ । असतो निष्प्रतिष्ठस्य यदहंत्वस्य भावनम् ॥ १६ ॥ हेम्न्यस्ति नोर्मिकादित्वमहन्ताद्यस्ति नात्मनि । अहन्ताभाववस्त्वेमं स्वच्छे शान्ते सिते परे ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

यह परम अविद्या है, यही माया है ओर यही संसार है, जो कि प्रतिष्ठारहित असत्‌ अहन्त्व की भावना होती है । जैसे सुवर्ण में अंगूठीयकत्व आदि नहीं हैं वैसे आत्मा मे अहन्त्व आदि नहीं हे । इस प्रकार स्वच्छ, शान्त, बन्धन आदिसे रहित परमात्मा में अहन्ता असत्‌ ही है, परमार्थ वस्तु नहीं है