Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 119, Verses 22–23
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 119, verses 22–23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 119 · श्लोक 22,23
संस्कृत श्लोक
सर्वं शान्तं निरालम्बं जगत्त्वं शाश्वतं शिवम् ।
अनामयमनाभासमनामकमकारणम् ॥ २२ ॥
न सन्नासन्न मध्यान्तं न सर्वं सर्वमेव च ।
मनोवचोभिरग्राह्यं शून्याच्छून्यं सुखात्सुखम् ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
सब जगत् का पारमार्थिक रूप
शान्त यानी अधिष्ठानसन्मात्र, निराधार, अविनाशी, कल्याणमय, दोष आदि से रहित, इन्द्रयों
से अग्राह्य, नामरहित, कारण रहित ब्रह्म ही है । वह न तो उत्पत्ति रूप भावविकार से युक्त है,
न नाशनामक भावविकारवाला है, न मध्य के भावविकारों से युक्त है और न सब है, सर्वरूप
भी वही है। मन वचन से उसका ग्रहण नहीं होता । वह शून्य से भी शून्य और सुखसे भी बढ़कर
सुख है