Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 119, Verse 25
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 119, verse 25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 119 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
परे शान्ते परं नाम स्थितमित्थमिदंतया ।
नेह सर्गो न सर्गाख्या काचिदस्ति कदाचन ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि आपको तत्त्व ज्ञात हो गया, तो फिर जो यह जगत् की प्रतीति है वह ब्रह्ममान ही है ।
निमित्त भूत अज्ञान का नाश होने से ही जगत्भेद और सृष्टि नाम का नाश हो गया, इस
आशय से श्रीवस्रिष्ठजी परिहार करते हैं ।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, परम तत्त्व सर्वोत्कृष्ट शान्त स्वस्वभाव में ही
स्थित है उससे च्युत नहीं हे । इस प्रकार पूर्णात्मभाव होने से सृष्टि और सृष्टि का नाम इदन्ता
से इस ब्रह्म में कभी नहीं हैं, किन्तु स्वस्वभाव से ही हैं