Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 119, Verses 29–30
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 119, verses 29–30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 119 · श्लोक 29,30
संस्कृत श्लोक
ईषद्विदः स्वयं चित्त्वाच्चेत्यतामिव गच्छति ।
बुद्ध्यते सर्ग इत्येव समास्थास्यति शाश्वतम् ॥ २९ ॥
सर्गस्तु परमार्थस्य संज्ञेत्येव विनिश्चयः ।
नानास्ति नायमत्यन्तमम्बरस्य यथाम्बरम् ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
आपका बोध परिपक्व नहीं है, इसलिए
आपकी दृष्टि में चिद्रूप परमतत्त्व मानों चेत्यता को प्राप्त होता है और सृष्टिरूप से उसकी
प्रतीति होती है । वह सृष्टि ही ज्ञान का परिपाक होने पर अविनाशी ब्रह्म स्वरूप हो जाती है।
कारण कि उस समय अज्ञानियों द्वारा देखा गया यह भेद ऐसे ही बिलकुल नहीं रहता जैसे कि
आकाश का दूसरा आकाश नहीं है, यदि आकाश का दूसरा आकाश माना जाय, तो अनवस्था
हो जायेगी एवं परमार्थ का दूसरा परमार्थ नहीं है, इसलिए सर्गशब्द ब्रह्म का ही नाम है, ऐसा
विद्वानों का निश्चय हे