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Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 119, Verses 35–36

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 119, verses 35–36 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 119 · श्लोक 35,36

संस्कृत श्लोक

इदं पूर्णमनारम्भमनन्तमनघोदरम् । पूर्णे पूर्णपरापूरैः पूर्णमेवावतिष्ठते ॥ ३५ ॥ यदयं लक्ष्यते सर्गस्तद्ब्रह्म ब्रह्मणि स्थितम् । नभो नभसि विश्रान्तं शान्तं शान्ते शिवे शिवम् ॥ ३६ ॥

हिन्दी अर्थ

परमार्थिक दृष्टि होने पर तो यह जगत्‌ पूर्ण ब्रह्म ही अवशिष्ट रहता है, इस पर ूर्णमिदं पूर्णमदः पूर्णात्‌ पूर्णमुदच्यते । पूरणस्य पूर्णमादाय परूणमिवाऽवशिष्यते“ इस श्रुति को अर्थतः दिखलातेहै। यह पूर्ण उत्पत्तिरहित, नाशशून्य अतएव अन्य विकाररूपी दोषोंसे रहित है, क्योकि पूर्ण परमात्मा ही चारों ओर की व्याप्तियों से पूर्ण हे । इसलिए पूर्ण होकर पूर्ण ही सदा बना रहता हे, अणुमात्र भी अपूर्णता को प्राप्त नहीं होता जो यह सृष्टि दिखाई देती है, वह ब्रह्म ही ब्रह्म में स्थित है । जैसे आकाश आकाश में विश्रान्त है वैसे ही शान्त शिव में शान्त शिव स्थित हे