Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 119, Verse 8
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 119, verse 8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 119 · श्लोक 8
संस्कृत श्लोक
मृगतृष्णाम्भसि द्वीन्दावहंतारूपकादिषु ।
एतावदेव रूपं यत्प्रेक्ष्यमाणं न लभ्यते ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
ऐसी ही प्रस्रिद्धि दूसरे माया कार्य में दिखलाते हैं ।
मृगतृष्णा के जल में और दो चन्द्रमाओं के भ्रम में और अहन्ता आदि में यही रूप है, जो कि
विचार करने पर दृष्टिगोचर नहीं होता