Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 119, Verse 24
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 119, verse 24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 119 · श्लोक 24
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
अवबुद्धं समं ब्रह्म सर्वमेव मयाधुना ।
तथापि भूयः कथय सर्गः किमिव लोक्यते ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार निष्प्रपच पारमार्थिक एकरस ब्रह्म का बोध कराने पर भी उसमें चित्त्वृत्तिको
स्थिरकरने की शक्ति न होने से उससे लौटकर फिर विपरीत भावना से कातर हुए श्रीरामचन्द्रजी
पूछते हैं ।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्, यद्यपि मैंने इस समय सर्वत्र शम, सर्वरूप ब्रह्म को जान
लिया है तथापि फिर मुझे यह सृष्टि क्यों दिखाई दे रही है, इसे आप कृपा कर बतलाइये | भाव
यह है कि ज्ञान से अज्ञान का नाश होने पर अज्ञानमूलक जगत् का भी बाध हो गया, इसलिए
फिर जगत् की प्रतीति युक्त नहीं है