Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 119, Verse 4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 119, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 119 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
हेमं हेम्न्यूर्मिकां च त्वं गृहाणेत्युदितो यदि ।
यद्दीयते सोर्मिकेण तत्तदस्ति न संशयः ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
अहन्ता और अँगूठीपना कभी भी सत् नहीं है, इसलिए उनके उत्पत्ति और नाश भी नहीं
हो सकते । जायते, अस्ति, वर्द्धते, विपारिणमते, अपक्षीयते, नश्यति- इन छः भावविकारों में
बीच के चार सत् के ही होते है असत् के नहीं। वैसे ही उत्पत्ति और विनाश भी सत् के ही होते
है, असत् में शक्ति ही कहाँ है कि वह उत्पत्ति क्रिया का और नाश क्रिया का आधार बने। यदि
असत् के उत्पति और नाश हों, तो असत् के धर्म उत्पत्ति और विनाश भी असत् हो जायेंगे ।
ऐसी अवस्था में वे देखे नहीं जा सकते, क्योकि सत् का असत् से सम्बध नहीं हो सकता, इसलिए
सत् ही सुवर्ण अथवा ब्रह्म अंगूठी या अहन्तादि के वेष से उत्पन्न होता है, यह भाव है ।
त्याग और ग्रहण आदि क्रिया का सम्बन्ध भी सत् का ही देखा जाता है, असत् का नहीं
देखा जाता, ऐसा कहते हैं।
यदि तुम्हें सुवर्ण लेना हो, तो तुम मूल्य देकर सुवर्ण के लिए अँगूठी लो । इस प्रकार
मध्यस्थ पुरुष द्वारा कहे गये खरीदने वाले पुरुष के मूल्य देने पर बेचनेवाला पुरुष बहुत मूल्य
से जो सुवर्ण देता है वह सत्य ही है, इसमें कोई संशय नहीं है । इसी प्रकार ब्रह्म ही सम्पूर्ण
व्यवहारों का विषय है । उससे अन्य का तनिक भी व्यवहार में निरूपण नहीं किया जा सकता,
यह भाव है