Yoga Vasistha — Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 119, Verse 41
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Utpatti Prakarana (Creation), Sarga 119, verse 41 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उत्पत्ति प्रकरण · सर्ग 119 · श्लोक 41
संस्कृत श्लोक
यावद्विचारदहनेन समूलदाहं दग्धा न जर्जरलतेव बलादविद्या ।
शाखाप्रतानगहनानि बहूनि तावन्नानाविधानि सुखदुःखवनानि सूते ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
जब तक वासना के सहित अविद्या का विनाश सप्तम भूमिकारोहण पर्यन्त नहीं हुआ, तब
तक विक्षेपदु:ख तत्त्वज्ञ लोगों को भी प्रतीत होता है। इसलिए जीवन्मुक्ति सुख को वाहनेवाले
लोगों को भूमिका का अभ्यास करना चाहिए, इस आशयसे उपसंहार करते हैं ।
जब तक विचाररूपी अग्नि से अविद्यारूपी पुरानी लता समूल नहीं जली, तब तक वह
बहुत सी शाखाओं ओर लताओं के प्रतानों से व्याप्त सुखदुःख रूपी विविध वनों को
उत्पन्न करती है