Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 62
44 verse-groups
- Verse 1जगत्-समूह का जो अवलोकन किया, वह क्या एकदेश में स्थित होकर किया या चिदाकाशरूप शरीर से किय…
- Verse 2इनमें दूसरे विकल्प का अवलोकन कर महाराज वस्िष्ठजी उत्तर देते हैं महाराज वसिष्ठजी ने कहा :…
- Verse 3न तो उस समय मैं एक स्थान में स्थित हो रहा था और न तो मैं गतिमय हो रहा था, इसलिए इस अपरोक्…
- Verse 4एकदेशस्थिति आदि की कल्पना के बिना स्वात्सरूय से अनात्मदर्शन की अप्रश्निद्धि का दृष्टांत द…
- Verse 5असग उदासीन ओौर अवयवशून्य ब्रह्मभत का अवयव जगत् कैसे हुआ, इस पर कहते हैं / उस समाधिकाल मे…
- Verse 6उक्त अर्थ में स्वाप्निक जयत् के तरह के रूप को प्रमाण रुप से उपस्थित करते हैं / हे श्रीरा…
- Verse 7“यत्र त्वस्य स्र्ववात्मेवाभूत्तत्केन क पश्येत् इत्यादि श्रुति तो निर्विकल्प समाधि मे ली…
- Verse 8अनन्त-समुद्राभिमानी जीव समस्त जलचरों, तरंगों, आवर्तों एवं फेनको जैसे जानता है, वैसे ही मै…
- Verse 9जैसे अवयवी अपने अवयवों को अपने स्वरूप के अन्दर अपने से अनन्य ही समझता है, वैसे ही इन सृष्…
- Verses 10–11हे, श्रीरामचन्द्रजी, बोधस्वरूप आत्मा के साथ एेक्य को प्राप्त हुआ मैं अब भी उन नानाविध अने…
- Verse 12यह सारा विश्व हमारे सामने उपस्थित है । बोधस्वरूप आत्मा के साथ एकता को प्राप्त हुआ मैं घर…
- Verse 13क्या अकेले आप ही जानते हैं 2 इस पर नही" यह कहते हैं / जो-जो विवेकी पुरुष शुद्ध बोधात्मा क…
- Verse 14इस सर्वात्मस्वरूप दृष्टि का परिपाक हो जाने पर वेत्ता, वेदन ओर वैद्यरूप (ज्ञाता, ज्ञान ओर…
- Verse 15एक ही ज्ञान से व्यवहित तथा दरस्थ पदार्थों का दर्शन आपको कले हुआ, इस आशंका पर दष्टा द्वारा…
- Verse 16जैसे पृथ्वीमंडल का अभिमानी जीव पृथ्वी पर के निधि, धातु, रस आदि सभी पदार्थों को जानता है,…
- Verse 17श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे कमललोचन ब्रह्मन्, जब आप इस तरह अनुभव कर रहे थे, तब आर्या छन्…
- Verse 18महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, उस आर्या छन्द का पाठ करती हुई उसी प्रकार प्र…
- Verse 19यदि वह आपके समीप स्थित थी, तो फिर आपने बिना समाधि के ही पहले ही उसे क्यो नहीं देखा, इस पर…
- Verse 20आकाशस्वरूप मैं था, आकाशमय शरीरधारिणी वह थी तथा आकाशमय वह सारा संसारसमूह भी उस समय चिदाकाश…
- Verse 21यदि वह कान्ता आकाशरूप ही थी, तोफ़िर जीभ, ताल, ओठ एवं प्राणवायु के न रहने से केसे वह आर्या…
- Verse 22एवं आकाशस्वरूप आपके लिए भी उम्चके रूपदर्शन का पर्यालोचन करना कोड सरल काम नहीं है, यह कहते…
- Verse 23कल्पना से यह सव कुछ उत्पन्न हैं, इसमें स्वप्नद्रष्टान्त ही प्रमाण हैं; यह उत्तर देते हैं…
- Verse 24हे श्रीरामजी, जैसे आपके स्वप्न में चिदाकाश ही बाह्य तथा आभ्यन्तर पदार्थो के रूप से उदित ह…
- Verse 25यह तो मैं बहुत ही कम कह रहा हूँ कि वह सारा दृश्य प्रय चिदाकाश रुप ही स्थित था। तत्वतः विच…
- Verse 26हे श्रीरामचन्द्रजी, जगत् की वासना से उपहित चितिस्वभाव का जो निश्चय है वह एक परमार्थ महाध…
- Verse 27भद्र, शरीरस्थान करणों (जीभ आदि इन्द्रियों) की सत्ता में आपको कौन-सी प्रभा है ? जैसे उनके…
- Verse 28जैसे स्वप्नादि देहों की सत्ता है, वैसे ही यह भी है, जैसे यह है, वैसे ही वह भी है । असत्…
- Verse 29जैसे स्वप्न में पृथ्वी के ऊपर खेती आदि, रास्तों पर यातायात आदि तथा महल आदि के ऊपर शयन आदि…
- Verse 30जैसे स्वप्न मेँ न रहते हुए भी युद्ध के कोलाहल तथा यातायात का मनुष्य अनुभव करते हैं, वैसे…
- Verse 31स्वप्न के वैचित्रय में भी किसी अन्य हेतु की संभावना का तो अवकाश ही नहीं हैं, क्योकि अनवस्…
- Verse 32स्वप्न कैसे दिखाई देता है, यह पूछनेवाले को सभी लोग यही उत्तर देते हैं कि-जैसे तुम देखते ह…
- Verse 33चुषुप्तिसद्ृश प्रलय के अनन्तर प्रथम सर्ग से ही स्वप्नजन्तु की तरह कल्पना रूप विराटात्मा च…
- Verse 34तब क्या द्रष्टान्तभ्रूत स्वप्न- स्वभाव ही जगत है, नहीं! - ऐसा कहते हैं / हे श्रीरामजी, मै…
- Verse 35इस तरह अवान्तर प्रश्न का उत्तर देकर पूर्व में पूछी गयी कथा के शेष अंश को कहते हैं। तदनन्त…
- Verse 36भगवन्. शरीररलित आपका उसके साथ ग्रश्नादि व्यवहार कैसे हुआ, उत्त पर कहते है/ स्वप्न में स्…
- Verses 37–38उसके साथ उस समय का मेरा व्यवहार भी वैसा ही था, यह कहते है / हे श्रीरामचन्द्रजी, जैसे स्वप…
- Verse 39तब कहिये, जगत् और स्वप्न, ये दो नाम क्यों पड़े, इस पर कहते हैं / जैसे स्वप्न का जगत् चि…
- Verse 40आकार से स्वप्न का द्रष्टा साकार है, लेकिन सृष्टिरूप स्वप्न का द्रष्टा तो स्वतः चिदाकाश ही…
- Verse 41जैसे द्रष्टा और दृश्य दोनों निर्मल चिदाकाश ही हैं, वैसे ही द्रष्टा और दृश्य के मध्य में प…
- Verse 42निराकार चिदाकाश का जो हृदय के भीतर स्वतः जगद्रूप स्वप्न स्फुरित होता है, उस स्वप्न का जन्…
- Verse 43साकार आप लोगों का जो स्वप्न-जगत् निर्मल चिदाकाशरूप है तब मेरा निराकार ब्रह्मका स्वरूप जग…
- Verse 44उपादान आदि सामग्री के बिना अभित्ति में ही चिदाकाश इस जगद्रूप स्वप्न को बिना निर्मित हुए ह…
- Verse 45कोमल चिदाकाशरूप मिट्टी से हिरण्यगर्भनामक ब्राह्मण ने इन्द्रियरूपी झरोंखों से युक्त देहादि…
- Verse 46न तो कर्तृत्व है, न ये जगत् हैं, न भोक्तृत्व है, न आस्तिकता है ओर न कुछ नास्किता ही है,…