Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 62, Verse 31
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 62, verse 31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 62 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
वक्षि चेत्स्वप्नदृश्यश्रीः कस्मात्तदसमञ्जसम् ।
अवाच्यमेतद्धेतुर्हि नान्योऽस्त्यनुभवस्थितेः ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
स्वप्न के वैचित्रय में भी किसी अन्य हेतु की संभावना का तो अवकाश ही नहीं हैं, क्योकि
अनवस्था आदि दोष आ जाने के भय से सी वादियों के चुप हो जाने के कारण एकमात्र
अविद्योपहित चिदात्मा का ही यह स्वभाव है 'इस मेरे पक्ष की ही अन्त में स्रिद्धि है, यह कहते हैं ।
हे श्रीरामचन्द्रजी, यदि आप यह कहें कि यह स्वप्नदृश्यश्री कैसे हुई, तो आपका वह कहना
असंगत होगा । यह अवाच्य है, क्योंकि स्वप्नानुभवस्थिति से अन्य कोई दूसरा हेतु ही नहीं
है