Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 62, Verse 7
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 62, verse 7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 62 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
यथा पश्यति वृक्षः स्वं पत्रपुष्पफलादिकम् ।
स्वसंवेदननेत्रेण तथैतद्दृष्टवानहम् ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
“यत्र त्वस्य स्र्ववात्मेवाभूत्तत्केन क पश्येत् इत्यादि श्रुति तो निर्विकल्प समाधि मे ली जग्रत्
के दर्शन के अभाव का वर्णन करती है सविकल्प समाधि में जयत् के दर्शन के अभाव का
वर्णन नहीं करती, इस अभिप्राय से नेत्र आदि इन्द्रियों के बिना भी जगत् के अवलोकन में दूसरा
दष्टा देते हैं /
जैसे वृक्षदेहात्मभूत - वृक्ष का अभिमानी जीव पत्र, पुष्प, फलादि से सम्पन्न अपने को ही
देखता है, वैसे ही अपने ज्ञानरूपी नेत्र से मैंने इस सारे जगत् को देखा