Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 62, Verse 32
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 62, verse 32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 62 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
कथमालक्ष्यते स्वप्न इति प्रष्टुः प्रकथ्यते ।
यथैवं पश्यसीत्येव हेतुरत्रास्ति नेतरः ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
स्वप्न कैसे दिखाई देता है, यह पूछनेवाले को सभी लोग यही उत्तर देते हैं कि-जैसे तुम
देखते हो । तात्पर्य यह कि उसका अनुभव ही उसके प्रश्न का एकमात्र उत्तर है । यहाँ पर उसका
साधक कोई दूसरा हेतु नहीं है