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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 62, Verse 25

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 62, verse 25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 62 · श्लोक 25

संस्कृत श्लोक

न केवलं तु तद्दृश्यं यावत्तु विषये वयम् । जगच्चेदं खमेवाच्छं यथा तन्नस्तथाखिलम् ॥ २५ ॥

हिन्दी अर्थ

यह तो मैं बहुत ही कम कह रहा हूँ कि वह सारा दृश्य प्रय चिदाकाश रुप ही स्थित था। तत्वतः विचार करने पर तो इस समय यह सम्पूर्ण संसार भी विदाकाथ रूप ही हैं / यहाँ भरी शरीरादि भ्रान्ति से ही व्यवहारश्रम हो रहा है, यह महाराज वस्िष्ठजी कहते हैं / हमारे लिए केवल वही दृश्य चिदाकाशरुप था, ऐसी बात नहीं है, किन्तु ये जितने पदार्थ हम लोगों की बुद्धि के विषय हैं वे सबके सब तथा यह सारा संसार भी स्वच्छ चिदाकाश रूप ही इस समय भी ऐसे विद्यमान हैं, जैसे कि हमारे उस समाधिकाल में विद्यमान थे