Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 62, Verse 34
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 62, verse 34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 62 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
स्वप्नशब्देन बोधार्थं तव व्यवहराम्यहम् ।
दृश्यं त्विदं न सन्नासन्न स्वप्नो ब्रह्म केवलम् ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
तब क्या द्रष्टान्तभ्रूत स्वप्न- स्वभाव ही जगत है, नहीं! - ऐसा कहते हैं /
हे श्रीरामजी, मैं आपके बोध के लिए स्वप्न शब्द से व्यवहार करता हूँ। वस्तुतः यह दृश्यप्रपंच
तथा स्वप्न भी न तो सत् है और न असत् ही है, किन्तु केवल ब्रह्म ही है