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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 62, Verse 5

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 62, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 62 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

अनाकृतेर्निरवयवस्थितेस्तदा तथाऽभवाद्विमलचिदम्बरात्मनः । जगन्ति तान्यवयवजालकानि मे यथा स्वतो न विगलिता न वस्तुता ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

असग उदासीन ओौर अवयवशून्य ब्रह्मभत का अवयव जगत्‌ कैसे हुआ, इस पर कहते हैं / उस समाधिकाल में आकृतिशून्य निरवयवस्थिति सम्पन्न निर्मल चिदाकाश रूप हुए भी मेरे वे जगत्‌ मेरी सत्ता ही से सत्तावान होने से अवयवसमूह हो गये थे,जिससे कि मेरी वस्तुस्वभावता स्वतः नष्ट न हो सकी थी तथा स्वतः सत्ताशून्य होने से उनमें वस्तुता भी न थी, कहने का तात्पर्य यह कि उस समय वास्तविक अवयवता न हुई