Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 62, Verse 46
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 62, verse 46 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 62 · श्लोक 46
संस्कृत श्लोक
नो कर्तृता न च जगन्ति न भोक्तृतास्ति नास्तीति नास्ति न च किंचिदतो बुधः सन् ।
पाषाणमौनमवलम्ब्य यथाप्रवाहमाचारमाचर शरीरमिहास्तु मा वा ओ ॥ ४६ ॥
हिन्दी अर्थ
न तो कर्तृत्व है, न ये जगत् हैं, न भोक्तृत्व है, न आस्तिकता है ओर न
कुछ नास्किता ही है, अतः सम्पूर्णं दृश्यों का परिमार्जन हो जाने से उनका एकमात्र साक्षी ही
परमार्थ है । इसलिए हे श्रीरामचन्द्रजी, आप अपने भीतर पाषाणतुल्य मौनता का अवलम्बन करके
बाहर यथाप्राप्त प्रवाहपतित व्यवहार करते चलिये । जब तक प्रारब्ध कर्म का शेष है तब तक यह
शरीर रहे या इसके बाद न रहे - इसमें कोई विशेषता नहीं है