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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 62, Verse 39

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 62, verse 39 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 62 · श्लोक 39

संस्कृत श्लोक

स्वप्नोऽयं जगदाभोगो न किंचिद्वा खमेव च । निर्मलं ज्ञप्तितामात्रमित्थं सन्मात्रसंस्थितम् ॥ ३९ ॥

हिन्दी अर्थ

तब कहिये, जगत्‌ और स्वप्न, ये दो नाम क्यों पड़े, इस पर कहते हैं / जैसे स्वप्न का जगत्‌ चिदाकाशरूप ही है वैसे ही यह जगत्‌ भी चिदाकाशरूप ही है अर्थात्‌ दोनों एक-से हैं, केवल भेद इतना ही है कि जाग्रत काल के प्रारम्भ में जो जगत्‌ का भान होता है उसे स्वप्न कहते हैं और सृष्टि के प्रारम्भ में जिसका उद्भव होता है उसे जगत्‌ कहते हैं ॥ ३ ८॥ यह जो जगत्‌ का आभोग है वह स्वप्न ही है अथवा कुछ नहीं है, वह एकमात्र चिदाकाश ही है। क्योकि इस तरह जो कुछ दिखाई देता है वह सब निर्मल सत्‌ तथा ज्ञप्तिमात्र ब्रह्म ही जगत्‌ के रूप से स्थित है