Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 62, Verse 42
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 62, verse 42 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 62 · श्लोक 42
संस्कृत श्लोक
चिद्व्योम्नोऽनाकृतेः स्वप्नो हृदि स्फुरति यः स्वतः ।
सर्गस्तस्य कुतस्तेन साकृतित्वं कथं भवेत् ॥ ४२ ॥
हिन्दी अर्थ
निराकार चिदाकाश का जो हृदय के भीतर स्वतः जगद्रूप
स्वप्न स्फुरित होता है, उस स्वप्न का जन्म कैसे हो तथा वन्ध्यापुत्र के सदृश उस जगत् से वह
चिदाकाश साकार कैसे होगा ?