Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 62, Verse 21
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 62, verse 21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 62 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
शरीरस्थानकरणप्रयत्नप्राणसंभवैः ।
यदुदेति वचो वर्णैस्तत्कुतस्तादृशाकृतेः ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि वह कान्ता आकाशरूप ही थी, तोफ़िर जीभ, ताल, ओठ एवं प्राणवायु के न रहने से केसे
वह आर्या का पाठ कर सकी, यह श्रीरामवन्द्रकी पूछते हैं /
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे मुने, शरीर में स्थित जीभ, तालु, ओठ तथा प्राणों के प्रयत्नों
से उत्पन्न हुए वर्णो से जो वाक्य उत्पन्न होता है वह आकाशशरीरधारिणी उस, स्त्री से कैसे
उत्पन्न हुआ ?