Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 62, Verse 4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 62, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 62 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
यथाङ्गानि शरीरत्वे पश्याम्यापादमस्तकम् ।
चिन्नेत्रेणाप्यनेत्रेण तथैतद्दृष्टवानहम् ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
एकदेशस्थिति आदि की कल्पना के बिना स्वात्सरूय से अनात्मदर्शन की अप्रश्निद्धि का दृष्टांत
देकर निराकरण करते हैं /
जैसे देह में आत्मत्वबुद्धि होने से मैं पैर से लेकर मस्तकपर्यन्त सभी अगो को देखता हूँ, वैसे ही
मैंने इस चर्म चक्षु के बिना भी चिद्रुपी चक्षु से जगत्समूह देखा