Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 62, Verse 2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 62, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 62 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
संघशोऽहमनन्तात्मा व्यापी व्योम तदा किल ।
स्यातां तस्यामवस्थायां कीदृशी तौ गमागमौ ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
इनमें दूसरे विकल्प का अवलोकन कर महाराज वस्िष्ठजी उत्तर देते हैं
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, जब अनन्त आत्मा सर्वव्यापक चिदाकाशरूप
हो गया, तब उस अनन्त अवस्था में मेरे गमन और आगमन कैसे हो सकते हैं ?