Guru's AddaGuru's Adda

Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 59

अद्वावनवँ सर्ग समाप्त उनसठवाँ सर्ग उक्त एकान्तशून्य प्रदेश मेँ समाधि टूट जाने पर वसिष्ठजी को सूक्ष्म ध्वनि का श्रवण और ध्वनिश्रवण के कारण के अन्वेषण के लिए ध्यान करने पर अनन्त कोटि जगत्‌ का ज्ञान होना- वर्णन।

61 verse-groups

  1. Verse 1इस तरह पिछले दो सर्गो से प्रासंगिक प्रश्नविषय का निरूपण हो जाने पर अब श्रीरामजी आख्यायिका…
  2. Verse 2महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र उस ध्यान से जब मैं जग गया, तब मैंने वहाँ एक ध्वनि सुनी, वह…
  3. Verse 3किसी स्त्री के कण्ठ से उत्पत्ति जनित स्वभावविशेष से मानों यह ध्वनि मृदु, मधुर ओर अनुकरणनश…
  4. Verse 4भद्र, वह भ्रमर की ध्वनि के सदुश थी, वीणा के झंकार के सदृश मनुष्य को लुभानेवाली थी । वह शब…
  5. Verse 5उसे सुनकर वहाँ मुझे वड़ा ही विस्मय हुआ । उक्त शब्दकर्ता के अन्वेषण के निमित्त से मैने दसो…
  6. Verse 6“जिन मार्गो में सिद्ध पुरुष ही संचरण कर सकते हैं, उनसे भी शून्य जो लाखों योजन दूर हैं, उन…
  7. Verse 7इसलिए इस एकान्त स्थान में स्त्रीवाक्य के सदृश ऐसे शब्द का संभव कैसे होगा और बड़े यत्न से…
  8. Verse 8मेरे सामने विद्यमान यह जो निर्मल आकाश है, वह तो असीम और चारों ओर से शून्यरूप ही है । बड़े…
  9. Verse 9उस तरह विचारकर बार-बार चारों ओर खूब देखा, परन्तु जब शब्द करनेवाले का दर्शन नहीं हुआ, तब इ…
  10. Verse 10“भँ सबसे पहले उपाधि का परित्यागकर चिदाकाशरूप हो जाऊँ, तदनन्तर चिदाकाश में अध्यस्त अव्याकृ…
  11. Verse 11अभी मैं ध्यान के प्रभाव से यहाँ पर यथास्थित देहाकाश को यहीं आकाश में छोड़कर चिदाकाशरूपी श…
  12. Verse 12उस तरह विचारकर पद्मासन में स्थित हुआ और शरीर को छोड़ने के निमित्त समाधि लगाने के लिए मैंन…
  13. Verse 13अनन्तर इन्द्रियो सम्बन्धी बाह्य अर्थो का स्पर्श तथा अन्तःकरण के विषयों का स्पर्श त्याग दि…
  14. Verse 14इसके बाद उनका भी क्रमशः परित्यागकर बुद्धितत्त्व के स्थान में पहुँच गया, फिर उसका भी त्याग…
  15. Verse 15भद्र इसके बाद उसी चित्स्वभाव से मैं भूताकाश के साथ एकरूप ऐसे बन गया, जैसे सामान्य जल के स…
  16. Verse 16उम्र ध्रूताकाश में भूताकाश के कार्यभ्रूत समस्त सरष्टियो' का अवलोकन करने के लिए चिदाकाश के…
  17. Verse 17भूताकाश की अवस्था को प्राप्त चिदाकाश में मैं तीनों लोकों के झुण्डों को, सैकड़ों संसारों क…
  18. Verse 18ये सब सर्ग अव्याकृत निर्मल आकाशमात्ररूप थे, इसलिए एक दूसरे की दृष्टि से छिपे थे उनमें अने…
  19. Verse 19इसमें दृष्टान्त देते हैं / एक समय सोये हुए पुरुषों के लिए वे सृष्टियाँ स्वप्नरूप थी, एक द…
  20. Verse 20उनमें कुछ तो उत्पन्न हो रही थी, कुछ नष्ट हो रही थी, कुछ तेजी से बढ़ रही थी, कुछ विद्यमान…
  21. Verse 21श्रीरामजी, उनके विषय में क्या वर्णन करूँ, कुछ तो अनेक चित्रों से शोभित, कुछ बड़ी-बड़ी दीव…
  22. Verses 22–23स्वप्न में देखी यई सृष्टियों में तो ब्रह्माण्डों करे आवरण और उनकी सख्या का कर नियम ही नही…
  23. Verse 24कुछ शून्य-आकाशरूप ही थीं, कुछ भूतो से भरी थीं, कुछ पाँच भूतरूप ही थीं, कुछ तो एक-एक पृथ्व…
  24. Verse 25किन्हीमे पृथ्वी, जल, तेज ये तीन ही थे, किन्हीं में कोई ओर ही भूत थे, किन्हीं मे तो पृथ्वी…
  25. Verse 26सिद्ध. विद्याधर आदि की जो चित्र-विचित्र कल्पनाएँ हैं; उनकी तो मनुष्य बुद्धि से सभावनाशरी…
  26. Verse 27कुछ सर्ग तो सुषुप्ति और प्रलयों से ही भरपूर थे यानी सुषुप्ति-प्रलयमय थे, किन्हीं में केवल…
  27. Verse 28सी अर्थ का विस्तार करते हैं / किन्हीमें विराग पैदा करनेवाले वेदादि शास्त्र थे और किन्हीं…
  28. Verse 29कहीं पर कलि का आरम्भ हो जाने के कारण वेदादि शास्त्रों का उच्छेद हो गया था, इसलिए ब्राह्मण…
  29. Verse 30कुछ सृष्टियाँ केवल जल से ही भरी थीं, कुछ केवल वायु से ही भरपूर थीं, कुछ परमाकाश में निश्च…
  30. Verses 31–32कुछ उत्पन्न हो रही थीं, कुछ वृद्धि प्राप्त कर रही थीं, कुछ चारों ओर से खूब पुष्ट हो रही थ…
  31. Verse 33किन्हीं में केवल देवताओं की ही सृष्टि थी, किन्हीं में अधिक केवल मनुष्य ही थे, किन्हीं में…
  32. Verse 34सैनिकों के स्वप्नों के सदृश उत्पन्न हुए बड़े भी कुछ सर्ग एक दूसरे से छिपे थे और किन्हीं क…
  33. Verse 35कुछ तो भिन्न-भिन्न तरह की सृष्टियाँ थी, कुछ असीम थीं, कुछ स्वच्छ आकाश के सदृश निर्मल थीं,…
  34. Verse 36कुछ सर्ग ऐसे थे, जिनमें दूसरे से मेल न (४0) एक पदार्थवादी आदियों के मतों से कहा गया है ।…
  35. Verse 37कुछ सृष्टियाँ ऐसी थीं, जिनमें एक दूसरी सृष्टि के लिए परलोक बन जाती थी यानी एक में मरकर पु…
  36. Verse 38इसीलिए अन्यवस्तु का अन्यत्र वर्णन करने पर अपरिनिष्ठित बुद्धिवालों की द्वष्टि मेये अगम्यता…
  37. Verse 39तब तो ऐसे पदार्थ आपके सद्र पुरुषों के उपदेश से ज्ञात हो जायेंगे, इस पर कहते हैं। भद्र, चै…
  38. Verse 40कुछ सर्ग तो ऐसे देखे कि वन के पत्तों के सदृश वे ही फिर सद्रूप उत्पन्न हो होकर नष्ट होते ज…
  39. Verse 41भद्र, कुछ सर्ग ऐसे थे कि एक ही चिति में सबका अध्यास होने के कारण पृथक्‌ अस्तित्व न रखने स…
  40. Verse 42अथवा वृक्ष और फल के सदश उनमें भेद और अभेद की कल्पना है, यह कहते हैं। परमार्थ चैतन्यरूप मह…
  41. Verse 43किन्हीं सर्गौ में स्वल्प ही कल्प का काल था, तो किन्हीं सर्गों में बड़ा लम्बा कल्प का काल…
  42. Verse 44सूर्य का अभाव होने से किन्हीं में कालज्ञान ही न हो पाता था, कुछ तो काकतालीय न्याय से अकस्…
  43. Verse 45वे क्या सत्य हैं; इस प्रश्न का नहीं" उत्तर देते हैं / परमचिदाकाश के कोश में वे शून्यरूप ह…
  44. Verse 46चिति के चमत्काररूप आकाश में यानी चिदाकाश में सैकड़ों समुद्र, सूर्य, आकाश, मेरु आदि पदार्थ…
  45. Verse 47वास्तव में कारणों के अभाव से कारणरहित पृथ्वी आदि का अनुभव तो भ्रमात्मक है, इसलिए ब्रह्मरू…
  46. Verse 48मृगतृष्णाजल के प्रवाह के सदृश अथवा दो चन्द्रयुक्त आकाश के वर्णं के ये जगत्‌ भ्रमरूप अनुभव…
  47. Verse 49चिति के संकल्परूप आकाश में ही ऐसे-ऐसे असंख्य जगत्‌ भासित हो रहे हैं, वे सबके सब वासनारूपी…
  48. Verse 50परब्रह्मरूपी उदुम्बरवृक्ष के अन्दर असंख्य देव, दानव आदि तो मच्छर हैं ओर वे ब्रह्माण्ड पवन…
  49. Verse 51चिदाकाश में ये सब जगत्‌ सुन्दर स्वभाववाले तथा सृष्टिरूप खिलवाड़ करनेवाले विशुद्ध चितितत्त…
  50. Verse 52ये जगत्‌ कल्प नगर हैं; इस बात को ढ़ करने में कोन -सा हेतु हैं; इसे बतलाते हैं / वे सब जगत…
  51. Verse 53निरन्तर तृप्ति से भरी हुई तथा रागरूपी रस से परिपूर्ण कर्मों के फलों को अवश्य प्रदान करनेव…
  52. Verse 54सृष्टि को बतलानेवाली श्रुति की दृष्टि से तो उन सबका कर्ता ब्रह्मा ही है और “अपूर्वमनपरम्‌…
  53. Verse 55वस्तुतः ये जगत्‌ परमार्थ चिद्रूप ही हैं, फिर भी अन्य से उत्पन्न मालूम पडते हैं, वस्तुतः अ…
  54. Verse 56भुवनो की संख्या चौदह, केवल देवयोनियों की संख्या से दश, मनुष्य आदि एक-एक जाति को लेकर एक,…
  55. Verse 57बान्धव और मित्ररूप बड़े-बड़े समारोहों से आक्रान्त हैं, फिर भी परमार्थदृष्टि से शून्यरूप ह…
  56. Verse 58ये सब क्षीरसागर के जल के सदृश चारों ओर स्नेह (प्रीतिरूप) सार से पूर्ण, तरगों के सदृश भंगु…
  57. Verse 59आत्मारूपी सूर्य के तेज के अन्दर वे केवल आभासरूप हैं ओर वायु से स्पन्दन की तरह वे सब स्वतः…
  58. Verse 60ये जगत्‌ बुद्धि अहंकार और चित्तरूपी पत्तों के लिए एक तरह से पेड ही हैं । तथा जैसे स्वप्न…
  59. Verse 61पुराण, वेद के सिद्धान्तरूप कल्पनाओं के स्वप्नों में दृढविश्वासरूपी गाढ निद्रा लेकर सोये ह…
  60. Verse 62भद्र. परमार्थभूत ब्रह्मरूपी महान्‌ जंगल में मायाउपहितचितिरूप गन्धर्व के द्वारा बनाये गये…
  61. Verse 63हे श्रीरामचन्द्रजी, मैंने उस समय की समाधि में अनन्त चिदाकाश में किसी कारण के बिना उत्पन्न…