Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 59, Verse 45
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 59, verse 45 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 59 · श्लोक 45
संस्कृत श्लोक
तानि शून्यत्वजालानि परमाकाशकोशके ।
अपरिज्ञातकालानि रूढान्यज्ञातदोषके ॥ ४५ ॥
हिन्दी अर्थ
वे क्या सत्य हैं; इस प्रश्न का नहीं" उत्तर देते हैं /
परमचिदाकाश के कोश में वे शून्यरूप ही हैं, सत्यरूप नहीं । वे कबसे उत्पन्न हैं, यह उनके
(७) कहीं पर “शेष्यमानानि” यह भी पाठ मिलता है, उसका “परिशेषरूपता को प्राप्त किये
हुए थे” यह अर्थ होगा ।
विषय में नहीं कहा जा सकता । हाँ, इतना कहा जा सकता है कि वे अज्ञानरूप दोष से युक्त
प्रत्यगात्मा में अनादिकाल से ही उत्पन्न हुए हैं