Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 59, Verse 2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 59, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 59 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
ततो ध्यानात्प्रबुद्धोऽहं श्रुतवांस्तत्र निःस्वनम् ।
मृदु व्यक्तपदं हृद्यं न च वाच्यनुगो यतः ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
महाराज
वसिष्ठजी ने कहा : भद्र उस ध्यान से जब मैं जग गया, तब मैंने वहाँ एक ध्वनि सुनी, वह
अत्यन्त लुभावनी थी, उसके शब्द अत्यन्त विस्पष्ट नहीं थे, क्योंकि उसमें न तो कोई पदार्थ
प्रतिपादन की सामर्थ्य थी और न वाक्यार्थ प्रतिपादन की ही सामर्थ्य थी