Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 59, Verse 4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 59, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 59 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
इन्दिन्दिररुताकारं तन्त्रीरणितरञ्जनम् ।
न रोदनं च पठनं बिसकोशसमस्वनम् ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, वह भ्रमर की ध्वनि के सदुश
थी, वीणा के झंकार के सदृश मनुष्य को लुभानेवाली थी । वह शब्द न तो कोई बालक का
रुदन था ओर न कोई प्रौढ व्यक्ति का पठन ही था । हाँ, कमल के बिसकोश में प्रसिद्ध भ्रमरों
के गुंजन के सदृश वह अवश्य था