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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 59, Verse 41

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 59, verse 41 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 59 · श्लोक 41

संस्कृत श्लोक

अन्योन्यत्वाच्च सदृशान्यन्यानि सदृशान्यपि । कंचित्कालं सुसदृशान्यन्यान्येव च कानिचित् ॥ ४१ ॥

हिन्दी अर्थ

भद्र, कुछ सर्ग ऐसे थे कि एक ही चिति में सबका अध्यास होने के कारण पृथक्‌ अस्तित्व न रखने से सदृश होते हुए भी असदृश ही थे ओर सदृश भी होते हुए कुछ समय तक अत्यन्त सदुश एवं कुछ काल के लिए अत्यन्त विसदृश भी रहते थे