Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 59, Verse 52
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 59, verse 52 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 59 · श्लोक 52
संस्कृत श्लोक
त्वमहं स इदं चेति धिया बलदृढान्यलम् ।
संपन्नान्यर्कदीप्त्येव पङ्कक्रीडनकानि च ॥ ५२ ॥
हिन्दी अर्थ
ये जगत् कल्प नगर हैं; इस बात को ढ़ करने में कोन -सा हेतु हैं; इसे बतलाते हैं /
वे सब जगत् "तुम", 'मैं', 'यह” आदि अभिमान बुद्धिबल से, सूर्य के दीप्तिबल से मिट्टी
के खिलौनों के सदुश, अत्यन्त दृढ़ बनाये गये हैं