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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 59, Verse 53

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 59, verse 53 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 59 · श्लोक 53

संस्कृत श्लोक

वृत्तानि रसशालिन्या नियत्या नित्यतृप्तया । वनान्युग्रफलानीव वसन्तरसलेरवया ॥ ५३ ॥

हिन्दी अर्थ

निरन्तर तृप्ति से भरी हुई तथा रागरूपी रस से परिपूर्ण कर्मों के फलों को अवश्य प्रदान करनेवाली नियति ने उनकी शाखा-उपशाखा के द्वारा ऐसे वृद्धि की है, जैसे वसन्त ऋतु की रसरेखा बड़े-बड़े फल लगनेवाले वनों की शाखा- उपशाखा द्वारा वृद्धि करती है