Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 59, Verse 37
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 59, verse 37 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 59 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
अन्योन्यं परलोकानि मिथः सिद्धपुराणि च ।
अन्यादृशमहाभूतान्यन्यादृग्दिग्गिरीणि च ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
कुछ सृष्टियाँ ऐसी थीं, जिनमें एक दूसरी सृष्टि के लिए
परलोक बन जाती थी यानी एक में मरकर पुरुष दूसरी सृष्टि में जाता था । कुछ सृष्टि ऐसी थीं,
जिनमें एक सृष्टि के प्रति दूसरी सृष्टि सिद्ध नगररूप बन जाती थी । किन्हीं सृष्टियों में अलग-
अलग स्वरूप के महाभूत थे और कहीं पर दिशाएँ एवं पर्वत भिन्न-भिन्न रूप के थे