Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 59, Verse 56
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 59, verse 56 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 59 · श्लोक 56
संस्कृत श्लोक
चतुर्दशदशैकादिविधभूतगणानि च ।
पुनस्तान्येव तान्यन्तरन्यान्यन्यान्यथो बहिः ॥ ५६ ॥
हिन्दी अर्थ
भुवनो की संख्या चौदह, केवल
देवयोनियों की संख्या से दश, मनुष्य आदि एक-एक जाति को लेकर एक, यों भिन्न-भिन्न
तरह के भूतसमूहों से युक्त वे अनेक होते हुए भी जगत् फिर एक ही रूप के हैं, किन्तु दूसरे ही
रूप के भीतर और बाहर उत्पन्न होते रहते हैं