Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 59, Verses 22–23
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 59, verses 22–23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 59 · श्लोक 22,23
संस्कृत श्लोक
निरावरणरूपाणि तथैकावरणानि च ।
पञ्चावरणयुक्तानि षडेकावरणानि च ॥ २२ ॥
दशावरणचित्राणि षोडशावरणानि च ।
चतुर्विशत्यावृतीनि षट्त्रिंशत्खावृतानि च ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
स्वप्न में देखी यई सृष्टियों में तो ब्रह्माण्डों करे आवरण और उनकी सख्या का कर नियम ही
नहीं है, क्योकि जिसको जितनी वासना हुई. उसके प्रति उतनी ही सृष्टि कल्पित होती हैं, इस
आशय से कहते हैं /
कुछ सृष्ट्या तो आवरणात्मक पदार्थों से रहित थी तथा कुछ एक आवरणवाली ही थीं ।
किन्हीं में पाँच आवरण थे, किन्हीं में सात आवरण थे, किन्हीं में दस आवरण थे, किन्हीं में सोलह
आवरण थे, किन्हीं में चौबीस आवरण थे, किन्हीं मे छत्तीस आवरण थे, कुछ आकाशरूप आवरण
से आवृत थी (70)